रहगुजर कितनी बची है ,
ये यहाँ किसको पता है ,
किन्तु जितनी भी बची है,
वो तुम्हारी ही अता है,
हर इबारत बस तुम्हारे ,
प्यार की छपने लगी है ,
कुछ बहारों ने लिखी है,
कुछ हमारी भी खता है ,
हम छुपाते जा रहे हैं ,
उन ग़मों को रात-दिन ,
दह रहे जो शोखियों की ,
खुशबुओं से रात-दिन ,
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