मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

वक्त पीछे जा रहा है,कुछ नहीं आगे बचा है,
प्यार के कुछ खंडहरों में जिन्दगी खोने लगी है ,
ये साँस भी चलती नहीं अब धड़कनों के साथ में ,
इस तरह मायुसियों को ,जिन्दगी दोने लगी है,
कुछ पिघलते आंसुओं में जिन्दगी बहने लगी है,
इस कदर खामोश होकर जिन्दगी रहने लगी है,

रविवार, 30 जनवरी 2011

धुंए की पर्त में अक्सर ,नज़ारे डूब जाते हैं,
म्रदु लहरों की पोरों से किनारे टूट जाते हैं,

कभी दिल की दीवारों पर ,गजल लिखना न तुम कोई,
दीवारों पर खुदे अक्षर ,पिघल कर छूट जाते हैं ,
जमीं की धडकनों से वो,लिपटकर रो रहा है क्यों,
पिघलते दिल ,फफोलों से , अंगारे वो रहा है क्यों,

उसे अब क्या मिलेगा ये ,बताना भी नहीं सम्भब,
अभागिन जिन्दगी में भी ,सितारे पो रहा है क्यों.
जमीं की धड़कनों से वो लिपटकर रो रहा है क्यों,
सुलगते दिल की आतिश से अंगारे वो रहा है क्यों ,
जमीं की धड़कनों से वो लिपटकर रो रहा है क्यों,
सुलगते दिल की आतिश से अंगारे वो रहा है क्यों ,