रविवार, 30 जनवरी 2011

धुंए की पर्त में अक्सर ,नज़ारे डूब जाते हैं,
म्रदु लहरों की पोरों से किनारे टूट जाते हैं,

कभी दिल की दीवारों पर ,गजल लिखना न तुम कोई,
दीवारों पर खुदे अक्षर ,पिघल कर छूट जाते हैं ,
जमीं की धडकनों से वो,लिपटकर रो रहा है क्यों,
पिघलते दिल ,फफोलों से , अंगारे वो रहा है क्यों,

उसे अब क्या मिलेगा ये ,बताना भी नहीं सम्भब,
अभागिन जिन्दगी में भी ,सितारे पो रहा है क्यों.
जमीं की धड़कनों से वो लिपटकर रो रहा है क्यों,
सुलगते दिल की आतिश से अंगारे वो रहा है क्यों ,
जमीं की धड़कनों से वो लिपटकर रो रहा है क्यों,
सुलगते दिल की आतिश से अंगारे वो रहा है क्यों ,

शनिवार, 29 जनवरी 2011

मेरे अनुमान में अधिक से अधिक १०००व्यक्ति, भारत में काला धन जमा कर ,विदेशी खातों में जमा कर सकते है,
शेष काला धन देश का, देश में खप जाता है /ये व्यक्ति 10 करोड़ से १०० करोड़ तक जुटाsakte हैं ओसतन २००० करोड़ प्रति वर्ष / यदि पिछले २५ वर्षों का जोड़ लगाया जाए = ५०,000 करोड़ /इसलिए काले धन की अतिश्योक्ति भ्रमित करने बाली है /ये काला धन केवल तभी जमा होगा जब आदान -प्रदान सुगम होगा जो इन १००० व्यक्तियों के लिए नाक में दम कर देगा /
कभी कोई निकलकर यों ,फ़ना,दुनिया से क्यों होगा,
कलेजा साथ में उसके ,किसी का सिल गया होगा,

किसी की वो महोब्बत थी, न पूछो हाल कैसा है,
कहाँ तक गल गया है वो, कहाँ तक हिल गया होगा,

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

नजारों में कहीं तो वो, नशीली -सी नजर होगी,
मुझे तुम ढूँढने तो दो,कहीं तो हमसफ़र होगी,

वहाँ कुछ बुलबुलें अपने ,सुरीले स्वर सुनाती हैं ,
वहाँ कुछ तितलियाँ उड़कर, छिटकती ,फुरफुरातीं हैं,
वहाँ कुछ फूल खिलते हैं ,वहाँ कलियाँ चटखती हैं,
हवायें जब गुजरतीं हैं ,नशे में थरथरातीं हैं ,

वहाँ घायल तमन्ना की,कँटीली -सी डगर होगी,
मुझे तुम ढूँढने तो दो,उसे मेरी खबर होगी ,

बुधवार, 26 जनवरी 2011

न पूछो अब किसी से ये ,कहाँ दिन -रात मिलते हैं ,
उसी की शोखियों में वो ,सुबह से शाम घुलते हैं,

उसी की धूप होती है, उसी की छाँव होती है,
उसी से वक्त रुकता है ,उसी से वक्त चलता है,

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

बहारें जब बनी होंगी ,उसी से वो सजी होंगी ,
किसी ने प्यार से पूछा ,भला दिल क्यों धड़कता है,
उसी के ख्याल आते हैं , उसी में डूब जाते हैं,
उसी के दिग -दिगन्तों में ,हमारा दिन गुजरता है ,
खींचती है हर लहर क्यों,
इस तरह मुझको यहाँ पर,
जिन्दगी ,अभियान जैसे ,
सिर्फ तेरा हो गई है,
एक धड़कन वक्ष में जो,
सिर्फ तेरे ही लिए है,
वो हरेक तूफ़ान से ,
आगे निकल कर हो गई है,

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

भावना के स्रोत हैं कुछ ,जो चिरंतन बह रहे हैं ,
एक गाथा जिन्दगी की ,मरूथलों से कह रहे हैं ,

रविवार, 9 जनवरी 2011

ब्रम्हांड के अपने समीकरण हैं ,अपना ग्राफ है, अपने समायोजन हैं ,जीवन -म्रत्यु -भाग्य /
जीव के अपने समायोजन ,मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता ,मगर वो फिर भी हारा है .....
जो हमें ,हमारे होने का अहसास कराती है ,हमारे अस्तित्व वजह बताती है ,
चारों तरफ प्रक्रति के अभिराम रूपों में हमें खींचती रहती है,.....

शनिवार, 8 जनवरी 2011

जीवन अभिनय ऐसा हो,
जिसमें गति हो, या लय हो,
जब कोई उर में झांके ,
बस उसका ही परिचय हो,
कहलाये ये मनुआ चितचोर,
बांधू कैसे ये ओर-चोर,

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

मेरी पलकों के सपनों में ,
निखिल जगत की अरुणाई है ,
बूँद अगर इक आंसू की है,
उसमें तेरी परछाईं है,
बांधू कैसे ये ओर -छोर ,
सीमित है माना सबकुछ ,
किन्तु असीमित इच्छायें,
जकड़ चुकीं हैं मुझको भी ,
जाने कितनी त्रष्णायें ,
पकडूँ कैसे मुक्ति की डोर,

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

गुनगुनी -सी धूप निकली ,
शीत में ठिठुरी हुई -सी ,
कोहरे की शाल में वो ,
प्यार से लिपटी हुई -सी,
क्या उसे इतना पता है ,
लोग कितने खुश हुए हैं ,
आ रही है वो यहाँ पर ,
लाज में सिमटी हुई -सी ,

बुधवार, 5 जनवरी 2011

रहगुजर कितनी बची है ,
ये यहाँ किसको पता है ,
किन्तु जितनी भी बची है,
वो तुम्हारी ही अता है,
हर इबारत बस तुम्हारे ,
प्यार की छपने लगी है ,
कुछ बहारों ने लिखी है,
कुछ हमारी भी खता है ,
हम छुपाते जा रहे हैं ,
उन ग़मों को रात-दिन ,
दह रहे जो शोखियों की ,
खुशबुओं से रात-दिन ,
रहगुजर कितनी बची है ,
ये यहाँ किसको पता है,

किन्तु जितनी भी बची है ,
वो तुम्हारी ही अता है ,
प्यार की अब हर इबारत ,
नाम से छपने लगी है ,
कुछ बहारों ने लिखी है ,
कुछ हमारी भी खता है ,
हम छुपाते जा रहे हैं ,
उन ग़मों को रात-दिन ,
दह रहे जो खुशबुओं की ,
बाजुओं में रात-दिन ,

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

हम समेटे जा रहे हैं ,
उन लम्हों को रात -दिन ,
जो कभी तुमने दिए थे ,
जिन्दगी को रात -दिन ,
शब्द के तिनके पिरोकर ,
भावनायें गुँथ रहीं हैं ,
व्योम में भटकी हुई -सी ,
कल्पनायें मथ रहीं हैं ,
कुछ तुम्हारी आँच आकर ,
तन -बदन को छू रही है,
कुछ तुम्हारी रश्मियों से ,
अल्पनायें बन रहीं हैं ,
हम पलटते जा रहे हैं ,
उन खतों को रात -दिन ,
जो कभी तुमने लिखे थे ,
धडकनों से रात-दिन ,

रविवार, 2 जनवरी 2011

राग कुछ ऐसे छिड़े हैं ,
तार कुछ ऐसे सजे हैं ,
प्यार के कितने संदेशे ,
रोज तेरे आ रहे हैं ,
रोशनी की वर्तिका है ,
पुष्प - गुछम सुष्मिता है ,
आर्द मन के रेशे -रेशे ,
पास तेरे जा रहे हैं ,