मंगलवार, 4 जनवरी 2011

हम समेटे जा रहे हैं ,
उन लम्हों को रात -दिन ,
जो कभी तुमने दिए थे ,
जिन्दगी को रात -दिन ,
शब्द के तिनके पिरोकर ,
भावनायें गुँथ रहीं हैं ,
व्योम में भटकी हुई -सी ,
कल्पनायें मथ रहीं हैं ,
कुछ तुम्हारी आँच आकर ,
तन -बदन को छू रही है,
कुछ तुम्हारी रश्मियों से ,
अल्पनायें बन रहीं हैं ,
हम पलटते जा रहे हैं ,
उन खतों को रात -दिन ,
जो कभी तुमने लिखे थे ,
धडकनों से रात-दिन ,

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